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Friday, November 9, 2018

यह दीपावली नहीं दीपदान उत्सव है || Dipawali Kya Hai ? Jane Hindi Me




*यह दीपावली नहीं, "दीपदान उत्सव' है।*
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जन उदय :- ब्राह्मणों ने बौद्ध और मूलनिवासी यानी असली भारत के मूलनिवासियों के इतिहास को या तो पूरी तरह ध्वस्त करने की कोशिश की या उनकी संस्कृति को अपसंस्कृति बनाने का प्रयास किया। दीपावली/यानी "दीपदान उत्सव" यह एक बौध्दों त्यौहार है। लेकिन ब्राह्मणों ने इसे अपनी काल्पनिक कथा से जोड़ दिया। रामायण वो काल्पनिक कथा है जिसका मंचन मध्यकाल अकबर शासनकाल में तुलसीदास दुबे नाम के ब्राम्हण ने शुरू किया था। वैसे भी इसे ध्यान से देखा जाए कि नवरात्रि के दौरान ही रामलीला का मंचन क्यों होता है? जबकि नवरात्रि की कहानी कुछ और ही है। इसी तरह ब्राह्मणों द्वारा/लिखे और बनाए गए रीति-रिवाज, सारे तीज त्यौहार सत्यता की कसौटी पर कहीं नहीं टिकते? 


1:- सही अर्थ में दीपावली को दीपदानोत्सव कहा जाता है।

2 :- यह एक बौद्ध त्यौहार है। 

3 :- इसकी शुरुआत प्रसिध्द बौद्ध सम्राट अशोक ने 258 ईसा पूर्व में की थी। 

4 :-  महामानव बुद्ध अपने जीवन में 84 हज़ार उपदेश दिये थे। 

5 :- अशोक सम्राट ने चौरासी हज़ार बुद्ध उपदेस के प्रतीक के रूप में चौरासी हज़ार विहार, स्तूप और चैत्यों का निर्माण करवाया था। पाटलिपुत्र का अशोकाराम उन्होंने स्वयं के निर्देशन में बनवाया था। 

6 :- सभी निर्माण पूर्ण हो जाने के बाद अशोक सम्राट ने कार्तिक अमावश्या को एक भव्य उद्घाटन महोत्सव का आयोजन किया। इस महोत्सव के दिन सारे नगर, द्वार, महल तथा विहारों एवं स्तूपों को दीप माला एवं पुष्प माला से अलंकृत किया गया तथा सम्राज्य के सारे वासी इसे एक त्यौहार के रूप में हर्सोल्लास के साथ मनाये। 

7 :- प्रत्येक घरों में स्तूप के मोडल के रूप में आँगन अथवा द्वार पर स्तूप बनाया गया, जिसे आज किला, घर कुंडा अथवा घरौंदा कहा जाता है। 

8 :- इस दिन उपशोध (भिक्खुओं के सानिध्य में घर अथवा विहार में धम्म कथा सुनना) किया गया, बुद्ध वंदना किया गया तथा भिक्खुओं को कल्याणार्थ दान दिए गए। 

9 :- इस बौद्ध पर्व को दीपदानोत्सव कहा गया। इसी दिन से प्रत्येक वर्ष यह त्यौहार मनाये जाने कि परंपरा की शुरुआत हुई।

10 :- कार्तिक माह वर्षा ऋतू समाप्ति के बाद आता है। इस माह में बरसात के दौरान घर - मोहल्ला में जमा गंदगी, गलियों के कचरे के ढेर, तथा घरों के दीवारों और छतों पर ज़मी फफूंदी, दीवारों पर पानी के रिसाव के कारण बने बदरंग दाग-धब्बे आदि की साफ - सफाई की जाती है। रंग-रोगन किये जाते हैं। इसके बाद एक नई ताजगी का अनुभव होता है। यही कारण है कि अशोक सम्राट ने सभी निर्माणों के उद्घाटन के लिए यह माह चुना।
11 :- कृष्ण पक्ष की अमावश्या की रात्रि घनघोर कालिमा समेटे होती है। इसीलिये इस दिन स्तूपों विहारों का उद्घघाटन कर नगर में दीप जला कर उजाला किया गया। दीपक की लौ प्रकाश ज्ञान और खुशहाली का प्रतीक है। इस प्रकार कार्तिक कृष्ण पक्ष अमावश्य को बुद्ध देशना के प्रेरणा स्रोत नव निर्मित विहारों, स्तूपों का दीपदानोत्सव के साथ उदघाटन कर अशोक महान ने समता मूलक नए युग के आगमन का पूरे जम्बू द्वीप में दुदुम्भी बजा कर स्वागत का सन्देश दिया। 

12 :- दीपदानोत्सव दिवस के
दूसरे अथवा तीसरे दिन गोबर्धन पूजा होती है। जिसका सम्बन्ध असुर नायक कृष्ण से है। ऋग्वेद में काला असुर कृष्ण और इंद्र के बीच संघर्ष का वर्णन आया है। कृष्ण को देवदमन भी कहते हैं। अतः दीपावली का सम्बन्ध राम से नहीं मूलनिवासी असुर नायक कृष्ण से हैं। 

13 :- गोबर्धन पूजा के एक दिन बाद बैल पूजा (गाय-डाढ) होता है। यह सिन्धु घाटी सभ्यता के समय सांढ पूजा की परंपरा की मज़बूत कड़ी है। 

14 :- लेकिन मौर्य साम्राज्य के पतन और ब्राह्मण राज के आगमन के बाद दीपदानोत्सव दिवस का ब्राह्मणीकरण कर दिया गया।

15 :- बुद्ध पूजा के स्थान पर लक्ष्मी-गणेश पूजा शुरू हो गयी। शांति की जगह अशांति के प्रतीक पठाखे छूटने लगे।

16 :- बुद्ध के चौरासी हज़ार देशना को चौरासी लाख योनी का नाम दे दिया गया। 

17 :- इस प्रकार धम्म बंधुओं ! दीपदानोत्सव का पवित्र बौध पर्व ब्राह्मणी पर्व दीपावली में बदल गया और इसका सम्बन्ध राम -सीता से जोड़ दिया गया। 

18 :- इस बौद्ध पर्व के गौरव को लौटाने के लिए हमें इसे बुद्ध संस्कृति के अनुसार मानना होगा।

19 :- बुद्ध वंदना, धम्म वंदना, संघ वंदना, त्रिशरन, पंचशील का घर पर, विहार में सामूहिक पाठ करें। 


22 प्रतिज्ञाओं का पाठ करें। गरीबों, भिक्खुओं को दान दें। साफ श्वेत कपडा पहनें, मीठा भोजन करें, करवाएं, घरों पर पंचशील ध्वज लगायें।

20 :- पटाखे न छोडें, जुआ ना खेलें और मांस मदिरा का सेवन ना करें। 

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          जय भीम, जय भारत, जय मूलनिवासी

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