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Friday, September 14, 2018

पूना पैक्ट की सच्चाई - बाबा साहब पूना पैक्ट के बारे में - पूना पैक्ट समझौता क्या था 1993 - पूना पैक्ट आंदोलन (POONA PACT)

 
पूना पैक्ट क्या है ||  बाबा साहब पूना पैक्ट में क्या हुआ ||पढिए क्या है साइमन कमीशन "पूना पैक्ट  (POONA PACT) || POONA PACT KYA HAI
बाबा साहब फोटो

पूना पैक्ट की सच्चाई  "पूना पैक्ट (POONA PACT)"?

बाबा साहेब ने अछूतों/दलितों (SCs & STs) की समस्याओं को ब्रिटिश सरकार के सामने मजबूती से रखा और उनके निवारण के लिए कई विशेष ठोस सुझाव दिऐ। बाबा साहेब डा. अम्बेडकर की तर्कसंगत बातों को मान कर ब्रिटिश सरकार ने अछूतों के उत्थान के लिऐ विशेष सुविधाएँ/अधिकार देने के लिऐ 1927 में "साइमन कमीशन" भारत भेजा। हिन्दुओं, विशेषकर मोहनदास कर्मचंद गांधी, को साइमन कमीशन का भारत आना पसंद नहीं आया इसलिए "साइमन कमीशन गो बैक" का नारा लगाकर उन्होंने उसका जबरदस्त विरोध किया।

बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर ने ब्रिटिश सरकार को स्पष्ट किया था कि अछूतों का न केवल हिन्दुओं से अलग अस्तित्व है बल्कि वे जी भी गुलामों जैसा जीवन रहे है। इनको न तो सार्वजानिक कुओं/तालाबों से पानी भरने का अधिकार है और न ही पढ़ने लिखने एवं धन भूमि रखने का अधिकार है।  हिन्दू धर्म में अछूतों के अधिकारों का जबरदस्त अपहरण हुआ है। इनका अपना कोई अस्तित्व न रहे इसीलिए इन्हें जबरदस्ती हिन्दू धर्म का अंग घोषित किया गया है।

सन 1930, 1931, 1932, में लन्दन की गोलमेज कॉन्फ्रेंस में जहाँ बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ने अछूत कहे जाने वाले समाज की पुरजोर वकालत की वहीं गांधी जैसे हिन्दुओं ने सख्त विरोध भी किया। बाबा साहब ने ब्रिटिश सरकार को भी नहीं बख्सा और कहा कि क्या अंग्रेज साम्राज्यशाही ने छुआ-छूत को ख़त्म करने के लिए कोई कारगर कदम उठाया? ब्रिटिश राज्य के डेढ़ सौ वर्षों में अछूतों पर होने वाले जुल्मों में क्या कोई कमी आई है? बाबा साहेब ने गोलमेज कॉन्फ्रेंस में जो तर्क रखे वे इतने ठोस और मानवीय अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार को बाबा साहेब की बातों को ही मानना पड़ा।

16 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैक्डोनल्ड ने दलित प्रतिनिधित्व (Representation for Depressed classes) के लिए एक योजना की घोषणा की जिसे "कम्युनल एवार्ड" के नाम से जाना गया। इस अवार्ड में अछूतों को अनेक अधिकार मिले जिनमें प्रमुख था: प्रथक निर्वाचन  (separate electorate) अर्थात दुहरा वोटिंग अधिकार :

1.   प्रथम वे सुनिश्चित सीटों की आरक्षित व्यवस्था मे अलग चुनकर जाएंगे;

2.   दूसरा  उनको दो वोटों का अधिकार मिला:
      एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट अनारक्षित सीट के लिए।

इस अधिकार को दिलाने से बाबा साहेब डा. अम्बेडकर का कद समाज में काफी ऊँचा हो गया। डा. अम्बेडकर  ने इस अधिकार के सम्बन्ध में कहा...."पृथक निर्वाचन के अधिकार की मांग से हम हिन्दू धर्म का कोई अहित नहीं करने वाले है, ...हम तो केवल सवर्ण हिन्दुओं के ऊपर अपने भाग्य निर्माण की निर्भरता से मुक्ति चाहते है।"  यही वह अधिकार था जिससे देश के करोड़ों अछूतों को एक नया जीवन मिलता और वे सदियों से चली आ रही गुलामी से मुक्त हो जाते।

मोहनदास कर्मचंद गांधी 'कम्युनल एवार्ड' के जबरदस्त विरोध में थे। वे नहीं चाहते थे कि अछूत समाज हिन्दुओं से अलग हो, वे अछूत समाज को हिन्दुओं का एक अभिन्न अंग मानते थे। लेकिन जब बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ने गांधी से प्रश्न किया कि अगर अछूत हिन्दुओं का अभिन्न अंग है तो फिर उनके साथ अमानवीय एवं जानवरों जैसा सलूक क्यों किया जाता है? इस प्रश्न का जवाब गांधी बाबा साहेब को कभी नहीं दे पाऐ। बाबा साहेब ने मिस्टर गांधी से यहाँ तक कहा कि, "आप अछूतों की एक बहुत अच्छी नर्स हो सकते हैं परन्तु मैं उनकी माँ हूँ और माँ अपने बच्चों का अहित कभी नहीं होने देती।"

20 सितंबर, 1932 को गांधी ने कम्युनल एवार्ड के खिलाफ आमरण अनशन कर दिया....उस समय वे पूना की यरवदा जेल में थे। गांधी अपनी जिद्द पर अडिग थे तो बाबा साहेब भी किसी भी कीमत पर इस अधिकार को खोना नहीं चाहते थे।

आमरण अनशन के कारण गांधीजी मौत के करीब पहुँच गए। इस बीच बाबा साहेब को अनेकों धमकियों भरे पत्र मिलने लगे लेकिन बाबा साहेब को ऐसे पत्र जरासा भी विचलित नहीं कर सके।

मिस्टर गांधी की हालत दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी। इसी बीच बाबा साहेब को और खत प्राप्त हुए कि अगर गांधी जी को कुछ हुआ तो हिन्दू अछूतों की बस्तियों को उजाड़ देंगे... उन्हें मार डालेंगे...। उस समय अछूत/दलित लोग अनपढ़, विखंडित और आर्थिक रूप से बहुत ही ज्यादा दयनीय हालत में थे। वे हिन्दुओं/सवर्णों का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं थे। दूसरी ओर देशभर के तत्कालीन बड़े बडे हिन्दू नेताओं ने डा. अंबेडकर पर भारी दबाव डाला कि अगर गांधी जी मर गये तो न केवल आजादी का आंदोलन टूटेगा वरन् देश को आजादी ही नहीं मिल पाऐगी। उन्होंने प्रथक निर्वाचन (separate electorate) की जगह छूआछूत को जड़ से खत्म करने, राजनीति, शिक्षा, सरकारी सेवाओं, इत्यादि में जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने तथा सभी प्रकार की सामाजिक, धार्मिक और शैक्षणिक संस्थाओं में बिना भेदभाव प्रवेश करने का न केवल आश्वासन दिया बल्कि एक लिखित प्रारूप भी तैयार किया गया।  बाबा साहेब ने सोचा जब अछूत ही नहीं रहेंगे तो फिर मैं किसके लिए लड़ूंगा? इसलिए उन्होंने मित्रों और अन्य दलित नेताओं से गहन विचार विमर्श करने के बाद देश, धर्म और समाज हित में हिन्दुओं की बात मान कर उक्त प्रारूप पर हस्ताक्षर कर दिऐ। इस प्रकार हिन्दूओं और मूलनिवासियों/दलितों के बीच 24-09-1932 को पूना में एक लिखित समझौता हुआ जिसे पूना पैक्ट कहते है। इस पैक्ट पर देश की जानमानी 42 हिन्दू और दलित हस्तियों ने हस्ताक्षर किये जिनमें प्रमुख थे : Pt.Madan Mohan Malviya, Dr BR Ambedkar, Tej Bahadur Shapru,  MR Jayakar,  Rao Bahadur Rai Srinivasan, C. Rajagopalachari,   Dr Rajendra Prasad,  GD Birla, CV Mehta,  BS Kamat,  PG Solanki, Devdas Gandhi, G Gavai, etc.. इस समझौते का  25-09-1932 को बम्बई की एक बडी आम सभा में हिन्दुओं ने यह कह कर अनुमोदन किया कि, 

 "Henceforth, amongst Hindus no one shall be regarded as an untouchable by reason of his birth and they will have the same rights in all the social institutions as the other Hindus have." 

इस प्रकार अछूतों/मूलनिवासियों को हज़ारों सालों कि गुलामी से मुक्ति मिली। अतः सही मायने में पूना पैक्ट द्वारा दिया गया "आरक्षण" मूलनिवासियों/दलितों की आजादी है और इसी आरक्षण को ही बाद में संविधान में विभिन्न अनुच्छेदों के अंतर्गत लिखा गया है।  अतः आरक्षण पर उँगली उठाना न केवल गणमान्य हिन्दू पूर्वजों का अपमान है बल्कि देश, धर्म और समाज के साथ गद्दारी भी है जिसे किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

कृपया नोट करें कि अगर पूना समझौता Poona Pact) नहीं होता तो दलितों/मूलनिवासियों को तो अंग्रेजों से काफी कुछ (अलग राष्ट्र तक) मिल जाता लेकिन हमारा भारत कभी भी आजाद नहीं हो पाता क्योंकि आजादी दिलाने वाले महात्मा गाँधी भूख हड़ताल करते-2 सितम्बर,1932 में ही मर जाते और संघी तो थे ही अंग्रेजों के वफादार। इस संदर्भ में बाबा साहेब का नाम अमर रहेगा क्योंकि उन्होंने मिस्टर गांधी को जीवन दान देकर देश को आजाद कराने में विशेष भूमिका अदा की। 

बाबा साहेब ने अपने जीवन में मिस्टर गांधी को न तो महात्मा कभी कहा और न ही माना।  वे "ज्योतिबा फुले" को ही सच्चा महात्मा और अपना गुरु मानते थे।
कृपया इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
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जय भीम

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