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Thursday, August 23, 2018

आरक्षण क्या है? हम आरक्षण के समर्थक और विरोधी कब है,- ONLINE INDIA NOW

AMBEDKER PHOTO -SC ST OBC AARAKSHAN -आरक्षण क्या है? हम आरक्षण के समर्थक और विरोधी कब है,- ONLINE INDIA NOW
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आरक्षण क्या है? पहले इसके बारे में जानना अति-आवश्यकता है तभी हम मूल मूल धारणा जाननांगे। अलग अलग लोगो में अलग अलग मत है कोई कहता है होना चाहिए कोई कहता नहीं होना चाहिए। कोई कहता है संविधान की मूल अवधारणा के खिलाफ है। कोई कहता है जो बाबा साहेब लिख कर गए आरक्षण के बारे में उसके खिलाफ है।सबसे मूल बात जो है आरक्षण उसके बारे में लोग बात करना करना है लेकिन क्या वे इसके व्यापक स्तर को बहस का मुद्दा बनाना चाहते हैं शायद नहीं, क्योंकि किसी भी बहस कर ले उनका आरक्षण का मुख्य मुद्दा हमेशा जातिगत आरक्षण के साथ चिपकी हुई नज़र आती है। ऐसा क्यों है? ऐसा इसीलिए है क्योंकि वे आरक्षण की मूल अवधारणा जो बाबा साबब ने संविधान में रखी थी भली भाँती अवगत ही नहीं है और जब उसका पालन आज तक नहीं मिला पाया जाकी कारण से आप और हम इस बहस को एक मुद्दे के रूप में अपने मन मुताबिक उछालते रहते हैं। सबसे पहले आप आरक्षण के बारे में समझा इतना विरोध होने के वावजूद बाबा साब ने यह प्रावधान 

संविधान में रख दिया, ऐसा कैसे किया जाता है संविधान को बनाने के लिए धुंध आज की तारीख में मनुवादी कहलाने वाले लोग थे फिर भी इस बात की सार्वभौमिकता कैसे स्थापित हो गया की संविधान में आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए। कुछ ना कुछ तो रहना सत्यता इन बातो में तभी इस शब्द का प्रयोग संविधान में। कोई इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता है, लेकिन आरक्षण होना चाहिए या नहीं यह एक अलग मुद्दा है लेकिन आमलोगो की राय हमेशा से जातिगत आरक्षण के पास पास सिमट कर रहती है।

 
1932 में जब गोलमेज सम्मलेन में इस बात पर सहमति बनी की आरक्षण होना चाहिए तो आखिर इसका आधार क्या होना चाहिए तो वहाँ पर यह तय हुआ की समाज में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से लोग समाज के मुख्य धारा से वंचित रह गए है उनकी सूची तैयार की जाय और उस सूची के आधार पर समाज में इन लोगो के लिए कुछ प्रावधान रखा जाय ताकि इनको समाज की मुख्य धारा में शामिल किया जा सके और बाद में इसी को आधार बनाकर बाद में संविधान में प्रावधान रखा गया और इस सूची को संविधान में नाम दिया गया अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जनजाति बाद में इसी सूची में एक नया सूची शामिल किया गया जिसको नाम दिया गया अत्यंत पिछड़ा वर्ग। आरक्षण पेट भरने का साधन नहीं, इसका जो मूल अर्थ है वह है प्रतिनिधित्व। आरक्षण के द्वारा ऐसे समाज को प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया गया जो शुरू से समाज के अंदर दबे कुचले रहे है। इस प्रतिनिधित्वता को नाम दिया गया राजनितिक आरक्षण जो शुरुआत में संविधान में शामिल किया गया था पहले 10 सालो के लिए था। लेकिन जो सामाजिक आरक्षण उसकी अवधारणा इसके विपरीत है उसकी मूल अवधारणा यह थी की जबतक समाज के उपेक्षित लोग समाज के बांकी लोगो के बराबर खड़े नहीं हो जाते है तबतक यह लागु रहेगा क्योंकि सामाजिक आरक्षण का मूल मंत्र यही था की समाज के हरेक वर्ग के लोगो की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर पर एक नहीं हो जाते है तब तक जारी रहेगी। और आज़ादी के 67 सालो बाद भी समाज का एक बड़ा तबका अपनी मुलभुत सुविधाओ के लिए तरस रहा है तो उसके सामाजिक न्याय की बात करना बेमानी होगी।

दिक्कत यह है की लोग एक सन्दर्भ को दूसरे सन्दर्भ के साथ को जोड़ कर देखते है। जबकि एक सन्दर्भ हमेशा दूसरे सन्दर्भ से अलग होता है। लोग सामाजिक आरक्षण को जातिगत आरक्षण का नाम  देकर एक दूसरे को दिग्भ्रमित करने की कोशिश करते है, जबकि जातिगत आरक्षण कोई शब्द ही नही है। तो सवाल उठता है की अगर यह जातिगत आरक्षण नहीं है तो क्या है? यह एक सामाजिक आरक्षण है ना की जातिगत आरक्षण। अब सवाल उठता है तो आखिर दोनों में अंतर क्या है। यह सच है की यह जाती आधारित आरक्षण है लेकिन संविधान क्या कहता है इसके बारे में और संविधान सामाजिक आरक्षण कहता है ना की जातिगत आरक्षण। संविधान के अनुसार सामाजिक आरक्षण का मतलब होता है समाज में सामाजिक एकरूपता, आर्थिक एकरूपता और शैक्षणिक एकरूपता ही इसका आधार है। यही मूलतः संविधान कहता भी है।

हम आरक्षण के समर्थक और विरोधी कब है, यह जानना अति आवश्यक है। 85% जनता जो अनुसूचित जनजाति/अनुसूचित जाती/अत्यंत पिछड़ा वर्ग में आता है उसके लिए 49.5% आरक्षण उपलब्ध है जिसमे से आज भी इन 49.5% में से कितने भर पाते है। और बांकी 50.5% आरक्षण किनके लिए है जो मात्र 15% जनसँख्या है। यह तो बात हुई उन आरक्षण के बारे में जो सरकारी नौकरियों में संविधान की प्रतिबद्धता के तहत उपलब्ध है। उन आरक्षण का क्या जिसके ऊपर किसी भी तरह की संवैधानिक मज़बूरी नहीं है जैसे समाज में पंडिताई, मंदिरो/मठों में पुजारियो का स्थान।



आरक्षण का विरोध तब कहाँ चली जाती है जब लोग कूड़ा उठाते है, इसका विरोध तब क्यों भूल जाते है जब झाड़ू लगाना होता है, आरक्षण का विरोध तब क्यों नहीं होता है जब शादी की बात आती है, आरक्षण का विरोध तब क्यों नहीं किया जाता है जब दलितों के नाम पर लोगो को मंदिरो में प्रवेश को प्रतिबंधित किया जाता है।

               

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